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अखिल भारतीय अग्रवाल संगठन का लोगोअग्रांश

अग्रोहा यात्रा

महाराजा अग्रसेन से आज तक, समाज की कथा

इस कथा को धीरे-धीरे पढ़िए। इसका अधिकांश भाग परंपरा है, जो परिवारों में चली आई और समाज ने दोहराई; कुछ पड़ाव लिखित इतिहास हैं। हर पड़ाव बताता है कि वह कौन-सा है।

  1. परंपरा

    महाराजा अग्रसेन

    परंपरा के अनुसार, अग्रसेन का जन्म द्वापर युग के अंत में आश्विन शुक्ल प्रतिपदा को हुआ। इसी दिन अग्रसेन जयंती मनाई जाती है।

  2. परंपरा

    अग्रोहा, समानता का नगर

    उन्होंने अग्रोहा बसाया, जो आज हरियाणा के हिसार ज़िले में है। परंपरा के अनुसार यह व्यापारियों का नगर था, जहाँ पद से अधिक आचरण का मान था।

  3. परंपरा

    एक ईंट, एक रुपया

    जब कोई नया परिवार बसने आता, हर घर उसे घर के लिए एक ईंट और व्यापार के लिए एक रुपया देता। कोई परिवार अकेला शुरुआत नहीं करता था। यही परंपरा इस मंच का हृदय है।

  4. परंपरा

    अठारह यज्ञ और अहिंसा

    अग्रसेन ने अठारह यज्ञ किए। अठारहवें यज्ञ में उन्होंने पशु बलि से मुँह मोड़ा और कर्मकांड पर करुणा को चुना। इसलिए परंपरा साढ़े सत्रह यज्ञ गिनती है, और एक गोत्र “आधा” गोत्र कहलाता है, जो बाकी सभी के बराबर है।

  5. परंपरा

    अठारह गोत्र

    इन यज्ञों से अग्रवाल समाज के अठारह गोत्र बने, और परंपरा के अनुसार हर गोत्र एक ऋषि से जुड़ा है।

    18 गोत्र देखें
  6. परंपरा

    पूरे भारत में

    परंपरा के अनुसार, अग्रोहा के परिवार बाद में दूर-दूर तक फैले और व्यापार अपनाया, साथ में समाज के मूल्य भी ले गए।

  7. लिखित इतिहास

    1871: कथा लिखी गई

    भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने अपने निबंध ‘अग्रवालों की उत्पत्ति’ में महाराजा अग्रसेन की कथा संकलित की। इतिहासकार बताते हैं कि उनके स्रोत स्पष्ट नहीं हैं।

  8. लिखित इतिहास

    1983: अठारह गोत्र, सब बराबर

    अखिल भारतीय अग्रवाल सम्मेलन ने अठारह गोत्रों की सूची स्वीकृत की, ताकि किसी गोत्र को “आधा” न कहा जाए।

  9. लिखित इतिहास

    आज: अग्रांश

    वही वचन, नए रूप में: जो भी सदस्य जुड़ता है और सत्यापित होता है, समाज की दीवार में एक ईंट जोड़ता है, और समाज हर सदस्य को ऊपर उठाता है।

स्रोत

इस कथा का कोई एक ऐतिहासिक स्रोत नहीं है। यह पृष्ठ व्यापक रूप से मानी जाने वाली परंपरा और नीचे दिए स्रोतों पर आधारित है।

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